Atharvashirsha Meaning Hindi (भाग 9)
शान्तिमन्त्र ॐ भद्रङ् कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।भद्रम् पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिःव्यशेम देवहितं यदायुः ।। अर्थात : चारो दिशा में जिसकी कीर्ति व्याप्त हैं वह इंद्र देवता जो कि देवों के देव हैं उनके जैसे जिनकी ख्याति हैं जो बुद्धि का अपार सागर हैं जिनमे बृहस्पति के सामान शक्तियाँ हैं जिनके मार्गदर्शन से कर्म को दिशा मिलती हैं जिससे समस्त मानव जाति का भला होता हैं | Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices
Atharvashirsha Meaning Hindi (भाग 8)
श्लोक 14 अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा,सूर्यवर्चस्वी भवति ।सूर्यग्रहे महानद्याम् प्रतिमासन्निधौवा जप्त्वा, सिद्धमन्त्रो भवति ।महाविघ्नात् प्रमुच्यते ।महादोषात् प्रमुच्यते ।महापापात् प्रमुच्यते ।स सर्वविद् भवति, स सर्वविद् भवति ।य एवम् वेद ।। अर्थात :- जो आठ ब्राह्मणों को उपनिषद का ज्ञाता बनाता हैं वे सूर्य के सामान तेजस्वी होते हैं | सूर्य ग्रहण के समय नदी तट पर अथवा अपने इष्ट के समीप इस उपनिषद का पाठ करे तो सिद्धी प्राप्त होती हैं | जिससे जीवन की रूकावटे दूर होती हैं पाप कटते हैं वह विद्वान हो जाता हैं यह ऐसे ब्रह्म विद्या हैं | Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices
Atharvashirsha Meaning Hindi (भाग 7)
श्लोक 12 अनेन गणपतिमभिषिञ्चति ।स वाग्मी भवति ।चतुथ्र्यामनश्नन् जपतिस विद्यावान् भवति ।इत्यथर्वणवाक्यम् ।ब्रह्माद्यावरणम् विद्यात् ।न बिभेति कदाचनेति ।। अर्थात :- जो इस मन्त्र के उच्चारण के साथ गणेश जी का अभिषेक करता हैं उसकी वाणी उसकी दास हो जाती हैं | जो चतुर्थी के दिन उपवास कर जप करता हैं विद्वान बनता हैं | जो ब्रह्मादि आवरण को जानता है वह भय मुक्त होता हैं | श्लोक 13 यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति ।स वैश्रवणोपमो भवति ।यो लाजैर्यजति, स यशोवान् भवति ।स मेधावान् भवति ।यो मोदकसहस्रेण यजति ।स वाञ्छितफलमवाप्नोति ।यः साज्यसमिद्भिर्यजतिस सर्वं लभते, स सर्वं लभते ।। अर्थात :- जो दुर्वकुरो द्वारा पूजन करता हैं वह कुबेर के समान बनता हैं जो लाजा के द्वारा पूजन करता हैं वह यशस्वी बनता हैं मेधावी बनता हैं जो मोदको के साथ पूजन करता हैं वह मन: अनुसार फल प्राप्त करता हैं | जो घृतात्क समिधा के द्वारा हवन करता हैं वह सब कुछ प्राप्त करता हैं | Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices
Atharvashirsha Meaning Hindi (भाग 6)
श्लोक 11 एतदथर्वशीर्षं योऽधीते ।स ब्रह्मभूयाय कल्पते ।स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते ।स सर्वतः सुखमेधते ।स पञ्चमहापापात् प्रमुच्यते ।सायमधीयानो दिवसकृतम्पापन् नाशयति ।प्रातरधीयानो रात्रिकृतम्पापन् नाशयति ।सायम् प्रातः प्रयुञ्जानोऽअपापो भवति ।सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति ।धर्मार्थकाममोक्षञ् च विन्दति ।इदम् अथर्वशीर्षम् अशिष्याय न देयम् ।यो यदि मोहाद्दास्यतिस पापीयान् भवति ।सहस्रावर्तनात् ।यं यङ् काममधीतेतन् तमनेन साधयेत् ।। अर्थात :- इस अथर्वशीष का पाठ करता हैं वह विघ्नों से दूर होता हैं | वह सदैव ही सुखी हो जाता हैं वह पंच महा पाप से दूर हो जाता हैं | सन्ध्या में पाठ करने से दिन के दोष दूर होते हैं | प्रातः पाठ करने से रात्रि के दोष दूर होते हैं |हमेशा पाठ करने वाला दोष रहित हो जाता हैं और साथ ही धर्म, अर्थ, काम एवम मोक्ष पर विजयी बनता हैं | इसका 1 हजार बार पाठ करने से उपासक सिद्धि प्राप्त कर योगि बनेगा | श्लोक 12 अनेन गणपतिमभिषिञ्चति ।स वाग्मी भवति ।चतुथ्र्यामनश्नन् जपतिस विद्यावान् भवति ।इत्यथर्वणवाक्यम् ।ब्रह्माद्यावरणम् विद्यात् ।न बिभेति कदाचनेति ।। अर्थात :- जो इस मन्त्र के उच्चारण के साथ गणेश जी का अभिषेक करता हैं उसकी वाणी उसकी दास हो जाती हैं | जो चतुर्थी के दिन उपवास कर जप करता हैं विद्वान बनता हैं | जो ब्रह्मादि आवरण को जानता है वह भय मुक्त होता हैं | Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices
Atharvashirsha Meaning Hindi (भाग 5)
श्लोक 9 एकदन्तञ् चतुर्हस्तम्,पाशमङ्कुशधारिणम् ।रदञ् च वरदम् हस्तैर्बिभ्राणम्,मूषकध्वजम् ।रक्तं लम्बोदरं,शूर्पकर्णकम् रक्तवाससम् ।रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गम्,रक्तपुष्पैःसुपूजितम् ।भक्तानुकम्पिनन् देवञ्,जगत्कारणमच्युतम् ।आविर्भूतञ् च सृष्ट्यादौ,प्रकृतेः पुरुषात्परम् ।एवन् ध्यायति यो नित्यंस योगी योगिनां वरः || अर्थात :- भगवान गणेश एकदन्त चार भुजाओं वाले हैं जिसमे वह पाश,अंकुश, दन्त, वर मुद्रा रखते हैं | उनके ध्वज पर मूषक हैं | यह लाल वस्त्र धारी हैं | चन्दन का लेप लगा हैं | लाल पुष्प धारण करते हैं | सभी की मनोकामना पूरी करने वाले जगत में सभी जगह व्याप्त हैं | श्रृष्टि के रचियता हैं | जो इनका ध्यान सच्चे ह्रदय से करे वो महा योगि हैं | श्लोक 10 नमो व्रातपतये, नमो गणपतये,नमः प्रमथपतये,नमस्ते अस्तु लम्बोदराय एकदन्ताय,विघ्ननाशिने शिवसुताय,वरदमूर्तये नमः || अर्थात :– व्रातपति, गणपति को प्रणाम, प्रथम पति को प्रणाम, एकदंत को प्रणाम, विध्नविनाशक, लम्बोदर, शिवतनय श्री वरद मूर्ती को प्रणाम | Learn more about your ad choices. Visit megaphone.fm/adchoices